Tuesday, December 6, 2011

कुछ तो है जो है साये में

झूमता है कि बसंत का झोंका है या कोई दावानल
कुछ तो है जो है साये में

उ
छलती है कि कोई ललक है या कोई फ़न हलाहल
कुछ तो है जो है साये में

सुन्न है कि मेरी हसरतों के स्थापत्य
है या कोई बेकसी जो देती आदत का आराम
कुछ तो है जो है साये में

पुकारते हैं कि पाप करने के आमंत्रण
है या मेरे पागलपन का चिडचिडाता कोलाहल
कुछ तो है जो है साये में

स्थिर निशब्द लसलसाते संदेहों के इस दलदल में
ये साये हैं कि मेरे अस्तित्व कि उजाड़ बाम्बियाँ

3 comments:

  1. यार बता दिया करो जब कोई नई कविता पोस्ट करो तो! अपने कविता लिखने से भी परेशान लगते हो!! :-) अच्छी होती हैं पर हमें भी अच्छी कविताओं को पढ़ने की समझ है! :-) ऐसी भी क्या बात है?

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  2. ये एक और मसला हो गया - आपके ब्लॉग में अनोनिमस का आप्शन तो है ही नहीं - अपने को पुराने ब्लॉग का पासवर्ड ही नहीं मालूम था - अभी अभी ये नया बना दिया - ठीक से पता भी नहीं कि ये ब्लॉग ही बना है क्या क्यूंकि अभी तो ये आपके कमेंट्स पर वापिस लाया है. मैंने सोच नाम तो बता दूँ - मैं हूँ विद्या भूषण!

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  3. Dear Sir
    After Much research I have taken care of the your issue of Anonymous comments. Please keep coming back.

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