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Sunday, December 29, 2019

एक साझा ख़ामोशी

एक साझा ख़ामोशी
एक दूसरे के साथ डूब कर ख़ामोश हो जाना 
आवाज़ोंऔर शोरों के बीच तैरते सन्नाटे से बुन लेना 
कुछ ख़यालों से बने लिबास


एक खिलखिलाता बहाव चाहिए 
एक ग़ैरज़रूरी, बिना जोड़ा पर बेहद गहरे से जिया बहाव
ख़ामोशी गहरी होती जाती 
जब वो बोलना छोड़ बाँधना शुरू कर दे 

कुछ हासिल है अगर इस साँस लेते बही खाते का 
तो वो है
इस आरामदेह ख़ामोशी में तली
मेरी तेरी उम्रें 

वो सन्नाटा जो अचानक ही घेर गया था हमें
पसर गया था पुल बनके हमारे दरमियान
वो आज भी है मेरे होने में 
एक ज़िंदा जादू बनके 
30 Dec, 19

Monday, September 2, 2019

समझ एक भरी पूरी निर्धनता

समझ एक ठहराव है 
समझ का एक अभाव होता है 
सामंजस्य सम्मोहन और गति विहीनता

समझ एक लय की प्राप्ति है 
एक विलंबित 
प्रायः स्तब्ध लय
गति से परे 

समझ एक भरी पूरी निर्धनता है
गहरे नशे में सुस्त नदी
न भूख , न क्रोध , न तड़प
और शायद न ही कविता

समझ एक मुकम्मल प्यार है 
एक रंगीन सहमापन 
एक सुरों का बना पिंजरा
एक रुका हुआ घना काला आराम
 
समझौते  ज़िंदा रखते है
शायद सुखी भी
समझौते क़ीमत वसूलते है
और 
समझौते समझ से बने होते है। 
 
9 Aug, 2019

कुछ सूनेपन सा गहरा महसूस करूँ

एक लम्बी साँस सी बहती नीली नदी में 
सुलगता एक सपना 

चुभते सन्नाटे में बदल जाता है 
सीधी बात सा मुश्किल सपना

शब्द साज़िश करते 
आरोप सी ख़ामोशियों के महल बुनते 

कुछ सूनेपन सा गहरा महसूस करूँ और 
गहराई तुमको दूँ उपहार में
न विद्वता, न सौंदर्य बोध और न ही शर्म 
बस हो लरजता तड़पता 
मेरा सम्वेदन
और 
आदिम ख़ालिस आह्लाद सी 
सहज नग्न 
मेरी अभिव्यक्ति





8 June, 2019

बंजर नींद

खोजूँ
ताम्बे के झरने का पिघलता संगीत
रोने के आह्लाद से भारी धुँध
हार, पीड़ा और ख़ालीपन से बनी
एक लम्बी पीर सी नदी 

नशे सी हावी होती शिकायत
बंजर नींद 
जिसके ख़्वाब भी सोए हुए हैं
 
9 April, 2019

Saturday, August 18, 2018

कभी न थमने वाली अपूर्णता

एक ठहरी हुई सी अनंत प्यास
उसमें झूलते कुछ बिना जिए सपने
अमूर्त क़ैद 


एक कभी न थमने वाली अपूर्णता की
तरस
जो सिलती एक बेआवाज़ गूँज
बे पता आवारा हसरतें 


गर्म हवा से बनी सुनसान सड़कों सी
अजब मौजूदगी
बड़बड़ाती सोच ढलते सकून की 


ये उत्सव है ख़ाली दरारों का
ये संगीत है चुभते ख़ाली पन का
इसमें थिरकता मौत का अट्टहास ही तो है
सनद जीवन के कंगाल पूरेपन की


6 July, 2018

Wednesday, May 9, 2018

जीवन ही तो है

काले सन्नाटों से बना 
एक साँस लेता खालीपन 
सुप्त शांत शून्य 
पर है तो जीवन 

सूखी प्यास से तर  
हसरतों के ठूंठों से बना 
उम्र का दरख्त 
पर है तो जीवन 

यादों के पिघलते दर्द 
हताशाओं का बिखरता पागलपन 
महत्वाकांक्षाओं के बहते बंजर 
पर है तो जीवन 

प्रश्नचिन्ह बन ताकते सपने 
झीने वजन बुझते अरमानो के  
तैर जाती है रोती सी चांदनी 
पर है तो जीवन ही 

ये शुष्क पुलिंदे पराजयों के 
फुसफुसाते मर्सिये पलायन के 
पर 
उत्सव तो है 
जिजीविषा लपकती है 
सारे अंधेरों के रेशम 
पठारों के  संगीत 
और लुटने के गीत 
जीवन ही तो है. 

Wednesday, February 21, 2018

साझेपन की गुदगुदी

साझेपन की एक गुदगुदी होती है
वो कुछ और न पाने की बड़ी महत्वाकांक्षा
वो लू से उड़ते दुःख
वो बेहद गहरे से जी ख़ुशियाँ
वो गुनगुनाती शिकायतै
वो क़ीमती समझौते
वो साथ चले क़दमों की पदचापें

वो साथ के सन्नाटों से बनी मिट्टी
जो बुन देती है एक ब्रह्माण्ड 
समय के उलझे पानी से गुँधकर 

वो साथ के  धुएँ से बनी छेनी
तराशती है पुराण 
उन पिघलते अहसासों के 

कोई पूरा तो किसी का नहीं होता है 
पर किसी से पूरा ज़रूर होता है
तुम हो तो 
एक बेहतर पूरापन मेरा है। 

एक रिश्ता अधिकारों का 
समझौतों का 
वक़्त का 
और उन ग़लतियों का 
जो ख़ुद की जाती हैं 
पर अकेले नहीं

एक कोना 
जहाँ अलगाव नहीं जाता
जहाँ रोने से डर नहीं लगता 
जहाँ हँसता है 
सामान्य का सम्मोहन 
जहाँ, 
ऐ मेरी हमसफ़र,
तुम हो

Feb 22, 2018





क्या बातें करते होंगे...

उस प्रेत प्रहर में
जब रात
अपनी नीरव सूनी 
नियति से समझौता कर लेती है 
जब अंधेरा
अपनी काली रेशमी आत्मा
में स्थिर हो लेता है 
जब बिना बसे जंगल
अपने बियाबान सपनों को
सोख सुखा लेते हैं 
तब दो बिसरे दरख़्त
अपनी झबरी समझ में
रात की नदी के सूखे अंधेरे में
क्या बातें करते होंगे?

Feb 13, 2018

गलते पल

दरिया सा बिछा
गूँज सा पिघला
दर्द सा बहता
सुरुर सा घुलता
पाप सा लरजता
टीस सा ख़ाली
ऊँघती धूप से बने
इन गलते पलों के
बेआवाज़ संगीत का
भरापूरा कारोबार

26 Jan 2018

एक ग़ज़ल

धुँधले दर्दों से छील कर
उकेरी एक पिघली सी ग़ज़ल
कुछ उदास कुछ नाराज़
टीस की भट्टी में जमीं बर्फ़ सी ग़ज़ल 
भूले सुर की थिरकती पीर
उड़ती सी राख सी ग़ज़ल
प्यास के जलते सिलसिले
गर्म रेत की नदी सी ग़ज़ल 
अनाम कोनो की बेआवाज़ बारिश
किसी बेवजूद टापू पर कोंधती सी ग़ज़ल 
आवारा लमहों का सुलगता ख़ुमार
किसी बिना जिए पाप सी ग़ज़ल 
हारी सी एक धड़कन का इसरार
ख़ुद से एक बेतकल्लुफ़ शिकायत सी ग़ज़ल

25 Nov, 2017

Wednesday, November 22, 2017

खनकती ख़ामोशी

अल्हड़ हवा से सजे थे
बातें शिकायतें और वादे,
फिर क्यों फैल गया
चुप्पी का बुखार


चुप्पी की खनकती ख़ामोशी
घुलती एक सवाल सा बन


नशीले इंतज़ार सा ख़ालीपन


ये दूरी ये ख़ामोशी

ये सवाल और ये ख़ालीपन

क्या ख़ूब है तुम्हारी ये चुप्पी भी


कई तुम मिल जाते हो
तुम्हारे इस न होने में 


23 Nov, 2017

Friday, October 13, 2017

शोक

तुम्हारे न होने से लीपा हुआ 
मेरा होना,
पिघलता उजड़ता 
स्मृति का पिंजर,
यादों के चिथड़े बटोरती
मेरे चैन की मृगतृष्णा।

शोक होता नहीं,
बस जाता है 
हड्डियों में, कपड़ों में, किवाड़ों में
एक साथी की तरह 
कई बार एक चैन भरी गोद सा 

आप तो हो नहीं
आपके शोक का ही सहारा
इतना गहरापन तो 
आपकी तस्वीर में
आपके शोक में भी है

रहो मेरे साथ 
चाहे न होने का डंक बन कर ही ।
 
13 Oct, 2017

लम्हों के पतझड़

यूँ ही नहीं कहते कि
दिन 
डूबता है,
जैसे पुरानी छत से 
मिट्टी भरभुरा कर झरती है
वैसे ही 
लम्हों के भी पतझड़ होते है।

अभी तो पूरी मंडली थी
किस्सागो और शिल्पकार पलों की,
पता नहीं कब कहाँ 
घुल से गए 
अफ़वाह से पिघले ख़ालीपन में।

रह गयी है 
जाते खोते नीले धुएँ को 
पोटली में बाँधने की 
दिलफ़रेब हसरत

हो सकता है 
इन लम्हों का हिसाब
सूनेपन की बेरंग स्याही में हो
पर समझोगे तो पाओगे 
ये पल तुम्हारी हस्ती के आँगन को 
अपने न होने से लीप गए हैं। 

ग़ैर मौजूद पदचापों सा 
किसी बग़ैर जी नज़दीकी सा 
सन्नाटोंके झूमते संगीत सा 
एक क़ीमती नशे सा, 
वो खोया पल 
खुरच तो जाता है 
मेरे सम्वेदन को 
बना जाता है 
मेरे होने, न होने को ।

खेद सहित......

तक़ादा सा करते सड़क पर पड़े पथ्थर
अंधेरे में साये सा खड़ा पेड़ 
घूरता 
हवा की गुत्थी भी एक शिकायत सी लिए

मुड़ा तो धड़कन खड़ी थी 
तिरस्कार के शैवाल 
जीवन से बनी साँस भी 
कुछ घिसी कुछ छिली
एक पिघली सी हँसी गुज़री
पूछती

कब लिखोगे हमें

सफ़ेद काग़ज़ का डाँटता सा सूनापन
रोने की कसक भी दूर
समर्पण भी टुकड़ों में 
दर्द भी उधार सा 

एक भूले से सपने में कल मिला था 
शायरी के 
झिझकते उलाहने से 

कब लिखोगे?

सो आज ये 
खेद सहित......
 
30 Aug, 2017

Tuesday, August 22, 2017

नए आसमान से क्या मांगें

नए आसमान से क्या मांगें
उसके नए होने से ही दिल सम्हल जाता है
युगों से टंगा ये आसमान
कुछ कदम चलो बदल जाता है
हमारा दिल भी अजीब है
जो सम्हल जाता है।


4 April 2017

कुछ गहरा जियें

जीवन का कुछ कारोबार चले
इक सड़क से लम्बे लम्हे मे
इक डूबते से वैराग्य में
सिर्फ होठों पर ठिठकती
इक झीनी हंसी में
कुछ वेदना ढूंढे


अजीब असमंजस
सस्ती ख़ुशी समझ नहीं आती
दर्द का शूल विस्मृत
इक उदास सांस में
एक छिछली सन्तुष्टि के घूँट में
इक इठलाते अल्प विराम में
कुछ वेदना ढूंढे।
कुछ गहरा जियें

गंगा के ठंडे विस्तार सी
कोई गहरी ख़ुशी
खालिस चमकते नीले अंधरे सा
कोई गहरा दर्द
ऊपर ऊपर बहुत जिये
अब डूब कर भी जियें।

19 April 2017

कविता ज़िद भी है

मन के सूखते शमशान
छटपटा कर कुरेदो तो
कविता लिख तो जाती है

अपने अखड़पन में कमज़ोर
अपनी चोटों से तपी
किसी फ़क़ीर के अय्याश लम्हे सी
किसी हारे कुलीन के आख़री दान सी
नशे में हारी मर्यादा सी
लिख तो जाती है 


कविता अगर लत है, लहर है, भरम है
तो ज़िद भी है

7 January 2017

शायरी- एक भूला सा दर्द

धमनियों में धूप सा बहता
पलकों के पीछे जमा
एक भूला सा दर्द
अब अपना सा नहीं लगता


भूले रहते हैं
उन ख़ुशनुमा पराजयों की चुभन
स्तम्भित मौन
छिपा के रखी उन आवारागियों के संगीत

नहीं गुफ़्तगू होती अब
अपनी भूलों के कारवाँ से
ज़िद्दी सितमों के उन
संगमरमर से मुलायम अंधेरों से

कुछ मरती इन रंगीनियों ने मायूस करदिया
कुछ हम भी सयाने हो चले
शायरी को आवाज़ देने का मन तो करता है
पर ऐसे हसीन गुनाह हो जाते हैं, किए नहीं जाते

13 January, 2017

सामान्य का सम्मोहन

कभी रुक कर देखो
तिलस्मी रोमानियत की ख़ुमारी के झुरमुटे को थोड़ा हटा कर ,
दिखेगा...
छोटे सच सा सलोना
सामान्य का सम्मोहन

शायर का काम है उड़ना
कहीं लुट जाना
किसी गुनाह को जी कर अमीर कर देना
मगर
एक कुफ़्र ये भी करके देखो ....
एक उम्र से तराशी
घुले मौन सी शक्ति
नदी सी उदार
भीतर तक तृप्त
शाम के सूरज सी थकी मुस्कुराहट को पढ़ के देखो
उसमें बैठा
सामान्य का सम्मोहन

उन साझा समझौतों से पुख़्ता
ख़ुद के दर्द को नींव में दबा कर
साँस लेता , हँसता
हज़ारों परिकथाओ से गहरा
रोज़मर्रा की सच्चाई से बना प्रेम
उफ़ ये सामान्य का कभी ना दिखने वाला सम्मोहन

15 Feb, 2017

होने चाहिए कुछ घोंसले

वक़्त की खुरदुराहट
महज़
सपनों की मौत का सबब नहीं होनी चाहिए

बनने चाहिए कुछ घोंसले
जहाँ रह सके
शायरी


कुछ सिगरेट के धुएँ से
चाय के धब्बों से बने
अड्डे...
जहाँ रह सके
महफ़िल

उम्र सिर्फ़ झुकाए
उलझन सिर्फ़ उलझाए
प्यार सिर्फ़ डराए
नशा सिर्फ़ गिराए ...

ऐसे में
होने चाहिए कुछ
घोंसले
अड्डे
जहाँ रह सकें
कुछ सहमी सी हसरतें।

June 13, 2017