Wednesday, February 19, 2014

संवेदन के अजनबी

तप्त तमतमाता उद्दीप्त अंधेरो  का एक मटमैला पुलिंदा
सोता
अंतरतम के बिसरे से खंडहरों के तहखाने में
समझ के भटकते प्रकाश स्तम्भ
झुकते
सर खुजाते
इतना उन्मादित आग्रह
इतराती युवा मादकता की  अनगढ़ी सी जिद
और
इतना अँधेरा !
समझ के परे
विस्मृति की झीनी परतों  से बने बियाबान में
कभी सुलगती थी
पाप और आनंद से लीपी
एक भट्टी -
गर्माहट प्रत्यक्ष मूर्त और मांसल
ह्रदय आत्मा और शरीर कि जीवित उत्तेजना
एक प्रकट राग -
आज समझ और संवेदन  का
पराया भटका अजनबी। 

1 comment:

  1. Muktibodh ko padha tha maine! Barson pehle! Yakeen mano ye unki kavitaon kee yaad dilaati hain! Vidya Bhushan

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