पाप की नीली बूंदों से सिल कर
सजा रखी है अफवाह सी उडती जिंदगी
आसमान के स्याह सूनेपन को कुरेदते अक्सर सोचा कि
कैसे लडखडाना कितने सलीके से
बचा लेता है चाल की आबरू
कुछ दाग न हों तो
कैसे झेले कोई इन शफ्फाक भूतो को
एक अपना कोना
अबूझी सोच से बना
जहाँ अपराध बोध आता जाता न हो
हर शह भटकने की कच्ची मिट्टी की
समझ का सवेरा कही अटका हो
किसी सलेटी झुरमुटे में
सुरूर दर्द और उल्लास की बनी दीवारों पर न लगे हो खरा खोटा परखने के चकमक पत्थर
परखते हैं
कितनी सुन्दरता कितनी ख़ुशी और कितना भटकाव्
झेल सकती है ये
सहमी हुई हसरत सी जिंदगी।
सजा रखी है अफवाह सी उडती जिंदगी
आसमान के स्याह सूनेपन को कुरेदते अक्सर सोचा कि
कैसे लडखडाना कितने सलीके से
बचा लेता है चाल की आबरू
कुछ दाग न हों तो
कैसे झेले कोई इन शफ्फाक भूतो को
एक अपना कोना
अबूझी सोच से बना
जहाँ अपराध बोध आता जाता न हो
हर शह भटकने की कच्ची मिट्टी की
समझ का सवेरा कही अटका हो
किसी सलेटी झुरमुटे में
सुरूर दर्द और उल्लास की बनी दीवारों पर न लगे हो खरा खोटा परखने के चकमक पत्थर
परखते हैं
कितनी सुन्दरता कितनी ख़ुशी और कितना भटकाव्
झेल सकती है ये
सहमी हुई हसरत सी जिंदगी।
बहुत दिनों बाद याद आया कि आपके ब्लॉग पर कुछ नया ढूंढने जाना चाहिए! आने का सुफल ही है कि ये अच्छी कविता पढ़ने को मिली! शिल्प में थोड़ा effort जैसा लगता है लेकिन बिम्ब इतने सुन्दर बना लेते हैं आप कि लगता है शायद बिना एफर्ट के ये सम्भव ही ना होते! पूरी कविता में इतनी सारी सुन्दर तस्वीरें हैं कि छोटी सी कविता भी खूबसूरत picture book सी बन गई है! कहना होगा कि कमाल है ये कविता! कभी सुनना होगा आपको साथ बैठा कर - देखना है कि आप अपनी कविताएँ पढते कैसे हैं? अगर आप अच्छी ना पढ़ पाए तो आपकी कविताएँ मैं आपको पढ़ कर सुनाऊंगा! :-) सस्नेह - विद्या भूषण
ReplyDeleteसर इतने प्रेम से अगर कोई कविता पढ़ ली जाती है तो उसका प्रारब्ध खुद ही पूरा हो जाता है
Deleteइतने स्नेह के लिए शुक्रिया