Monday, November 10, 2014

हारी हुई शर्त सा एक खालीपन

हारी हुई शर्त सा
एक खालीपन
समय की सिलिईयों पर रेंगते हुए
बुनता है
खुशियों के आसमान पर
कुछ नीली खामोशियों के
दायरे

तुम्हारे न होने का अहसास
ही तो है
जो मायने देता है
इन लड़ती झगड़ती टीसों को

शोक मनाता मेरा ये वजूद
कुरेदता हसरतों की राख को
शायद हो कोई सुगबुगाहट
जिन्दा अहसासों की

अब तुम्हारे जाने का ग़म
ही तो है
आखरी सिसकी मेरे उन
जिन्दा अहसासों की

नुकसानों से सपने बुन लेने का हुनर
था हमें
पर इस सदमे पर कोई जादू काम क्यों नहीं आता।

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