क्या खूब है ये ख़ालीपन
कुछ नहीं से भर देता है पूरी तस्वीर।
होने लगती है मुठभेढ़ कुछ अनजानी सी टीसों से
धूप सा भर देता है उब की सुराही को।
एक भूली सी उम्र सहला जाती है
उन झपटे हुए लम्हों को।
कुछ न पहचाने भूत धुऐं से निकल
खुरच जाते हैं अपने दर्द
वो बातें जिनमें आवाज़ नहीं होती
खड़ी कर देतीं है
बिना जी आवारगी के सिलसिले।
सड़क की आवाजें याद दिलाती हैं
अपने भूले उधारों की
कुछ हसरतें , कुछ पागलपन, कुछ पाप
फुसफुसाता है
चौंकाता है।
इंतज़ार में, पर पूरा मुतमईन एक दरख्त
झुक कर पूछ ही लेता है
चलोगे कुछ दूर मेरे साथ
मैं हूँ कि मुझ में ही उलझा रह जाता हूँ
क्या खूब है ये ख़ालीपन
कुछ नहीं से भर देता है पूरी तस्वीर।
होने लगती है मुठभेढ़ कुछ अनजानी सी टीसों से
धूप सा भर देता है उब की सुराही को।
एक भूली सी उम्र सहला जाती है
उन झपटे हुए लम्हों को।
कुछ न पहचाने भूत धुऐं से निकल
खुरच जाते हैं अपने दर्द
वो बातें जिनमें आवाज़ नहीं होती
खड़ी कर देतीं है
बिना जी आवारगी के सिलसिले।
सड़क की आवाजें याद दिलाती हैं
अपने भूले उधारों की
कुछ हसरतें , कुछ पागलपन, कुछ पाप
फुसफुसाता है
चौंकाता है।
इंतज़ार में, पर पूरा मुतमईन एक दरख्त
झुक कर पूछ ही लेता है
चलोगे कुछ दूर मेरे साथ
मैं हूँ कि मुझ में ही उलझा रह जाता हूँ
क्या खूब है ये ख़ालीपन
क्या खूब है ये खालीपन!
ReplyDeleteक्या खूब है सचमुच! कुछ महीनों बाद आज आपके ब्लॉग पर आया तो दो तीन नई और बहुत अच्छी कविताएँ देखने को मिलीं! अच्छी कविताएँ लिखने से या सिर्फ अच्छी रचनाएँ ब्लॉग पर डालने के कारण संख्या कम लग रही है! कभी कभी अपनी रचनाएं अच्छी होती हुईं भी खुद को नहीं जचतीं, इसलिए ब्लॉग पर डालने में कंजूसी ना किया करें! यहाँ इतना ही! मिलने पर इस भाषण को थोड़ा बढ़ाया जा सकता है! :-) विद्या भूषण