अच्छा खासा सोच लेते थे
कुछ अय्याश गीत यारी मान
चले भी आते थे।
शिथिल होते सपनों को भी शर्म नहीं आती थी
अपनी गुनाहगार ज़लालत साझा करने में।
कुछ अय्याश गीत यारी मान
चले भी आते थे।
शिथिल होते सपनों को भी शर्म नहीं आती थी
अपनी गुनाहगार ज़लालत साझा करने में।
हो जाती थी बेपरवाह गुफ्तुगू
अपने रेशमी पापों से।
बुझी सिगरट सी चपटी हसरतें भी सोच लेती थी
इक अन्गढ़ी सी जीत।
अब सलीका आड़े आ जाता है।
अपने रेशमी पापों से।
बुझी सिगरट सी चपटी हसरतें भी सोच लेती थी
इक अन्गढ़ी सी जीत।
अब सलीका आड़े आ जाता है।
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