Monday, August 15, 2016

लकीरें और कुछ सफेदी

पता तो है
कि
चाँद एक मुठ्ठी में नहीं आता
संसार मेरे बस्ते में नहीं धड़कता
समझ में आता है
रोजी रोटी का कारोबार
अब बड़े हो गए हैं
बड़े?
शायद।
पता तो नहीं चलता
हाँ हैं कुछ
लकीरें और कुछ सफेदी
पर वैसे ही लफंगी हैं हसरतें
वैसी ही घबराहट
वैसे ही लपकता है आवारा पागलपन
आज भी किसी चेहरे, किसी गोद या मुस्कुराहट
में देख लेते हैं ब्रह्मांड की सीमाए
पर पता है
फडफडाता झंडा
खून खौलाने वाला नारा
15 अगस्त का लड्डू
आज़ादी नहीं है
क्यों इतने बड़े हो गए

15 August, 2016

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