Thursday, April 27, 2017

वो पिघलते साक्ष्य सा संवेदन

शायद उधार ही लिया था 
वो पिघलते साक्ष्य सा संवेदन ,
एक क्षण को वो ही तो था 
ऊंघते ब्रह्माण्ड का उन्मादित आमंत्रण 

पर उफनती  नदी सिर्फ बह  नहीं रही थी 
चल और जल भी रही थी ,
छोड़ती  पीछे मृत सूखे पठार 
वो पिघलते साक्ष्य सा संवेदन 

उदास प्यास की तरेड़ें 
कुरेदी बड़े जतन  से उड़ते युगों तक,
कुछ आदत तो कुछ हमारा आलस  
गुम गया, खो गया 
वो पिघलते साक्ष्य सा संवेदन 

28 April, 2017

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