Wednesday, May 9, 2012

सौदा बुरा नहीं है

मांसल विमुखता का उन्माद,
उन्मुक्त उपेक्षा का अट्टहास,
बांधे तो रखता है।
मादकता के आले मे 
पाँव रख 
जीवन की अटारी से
जिजीविषा बटोरना,
सौदा बुरा नहीं है।

-   जून 2005

Tuesday, April 10, 2012

चमकते सुर का एक कांटा

किसी चमकते सुर के कांटे से
दिमाग के अय्याशगाह में
उकेरी थी एक नीली झील।

झील में से सूखी निकलती
मेरी पराजित हसरतें
सुख आह्लाद और उन्माद की काजल कोठरी
और शफ्फाक हार लपेटे हुए बाहर आता मेरा संतुष्ट सा एक प्रेत।

तिलस्मी भुलभुलिया में और भटके
न खोने का आवारा रोमांच न रहस्य की छेड़ती सी चुभन
उठा कर स्वयं की यादों की छेनी
कुरेदी एक सुरंग
यथार्थ के चीखते शहर में।

कर्णभेदी उत्पात रंगीनियों के दैत्यों का
मोहक सम्मोहन ज़िन्दगी के मांसल सौष्ठव का
कुछ उछलता तो है
एक तस्वीर सी उभरती भी है,
पकड़ने को लपकती भी हैं अभिलाषाएँ
पर अनगढ़ा सा एक धुँआ निर्विकार निकल जाता है

रह जाता है वही चमकते सुर का एक कांटा
अपरिभाषित श्लेष्मी झिल्ली का एक पुल
संभावना एक उलझाव की, एक लगाव की।

Sunday, January 29, 2012

सफ़ेद निर्जीव शून्यता कागज की

पथरीला सन्नाटा, स्तंभित संवेदन
भूलने लगे हसरतों की दुत्कार भरी आहटें ।
जर्जर स्वय की भरभराती मिटटी में भी देख लेते थे
चमचमाता उदास संगीत।
पतन पराजय का सुकून भरा अपमान भी छेड़ जाता था
कुछ अनसुने से राग।
तुम्हारी उपेक्षा खींच ले जाती थी अहसासों के
काले डरावने से ख्वाबगाह में।
हसरतें सहमती थीं तो भी अबूझ अँधेरा
गढ़ता थे सांवले संगमरमर के कुछ सकपकाए से प्रश्नचिंह
अब है सफ़ेद निर्जीव शून्यता कागज की
नहीं पूछती 'कौन तुम'

Tuesday, December 6, 2011

कुछ तो है जो है साये में

झूमता है कि बसंत का झोंका है या कोई दावानल
कुछ तो है जो है साये में

लती है कि कोई ललक है या कोई फ़न हलाहल
कुछ तो है जो है साये में

सुन्न है कि मेरी हसरतों के स्थापत्य
है या कोई बेकसी जो देती आदत का आराम
कुछ तो है जो है साये में

पुकारते हैं कि पाप करने के आमंत्रण
है या मेरे पागलपन का चिडचिडाता कोलाहल
कुछ तो है जो है साये में

स्थिर निशब्द लससाते संदेहों के इस दलदल में
ये साये हैं कि मेरे अस्तित्व कि उजाड़ बाम्बियाँ

Sunday, October 16, 2011

चलो कुछ करें

उहापोह की झील में हिचकोले खाती महत्वाकान्छा
उकता देने वाली बहस से लम्बे इस जीवन का
चलो कुछ करें
कुछ पाप, कुछ संशय, कुछ अँधा जूनून
हसरतो के सरकते प्यालों में उकेरे हुए इन सपनो का
चलो कुछ करें
सहमा अधखुला अचकचाता सा इच्छाओं का झुरमुट
अँधेरे से पसरे इस सन्नाटे का
चलो कुछ करें
चौकीदार की रात सी लम्बी इस दिनचर्या में
इस पिटी हुई मादक रसिकता का
चलो कुछ करें



Thursday, August 18, 2011

भयभीत प्रसन्नता

उछलती उत्साहित सहमतियाँ
साहसपूर्ण संभावनाओं का बेहिचक आलिंगन
कुल्मुलाती उत्कंठा पाती सुखद सुरक्षित आमंत्रण
अपने छुद्र अस्तित्व से उठ कर
कुछ ब्रह्मांडीय छूने का अन्गढ़ा सा अहसास
और स्वच्छ जीवन शक्ति का निर्मल उल्लास
सही है
समय का दर्पण
सही है
जन भावनाओं का मूर्तीकरण
पर संशय क्यों
और कुछ भय भी

(अन्ना आन्दोलन के दौरान )

Wednesday, August 3, 2011

सुस्त आहें

अय्याश लम्हों की कुछ सुस्त आहें
एक अल्हड़ सी प्यास, एक अचकचाती सी फ़िक्र
फुर्सत का आरामदेह नशा उकेरता
उछाह भरे शुन्य मैं नई टीसें
उदासी के धंसते दरिया में खींचता
खालीपन के कसीदे