Wednesday, April 30, 2014

गुलज़ार को फाल्के सम्मान के अवसर पर-

कोई कोई दिल के अन्दर बैठ कर रचता है।
महींन हसरतो से बुनता है,
गीतों की झीनी सी एक दीवार।
पन्नो पर बिखरते है सुर्ख तीखे रंग
मिलते हैं आवारा अल्हढ़ अय्याश टीसों से,
एक साजिश है अन्गढ़ी आस की
एक उमंग है झूलती झुलसती प्यास की।
सामने बैठी सुबह
अलसाए भीगे बाल
थरथराती मादकता
रजाई सरीखा काला आराम
मिलते हैं उस ठिठकी हुई कलम की नोक पर।
तुम हो तो
आत्मा की गहरी कालकोठरी में भी
खिचते है
सुरमई इन्द्रधनुष
तुम हो तो मुलायमियत का कारोबार है।

Wednesday, February 19, 2014

संवेदन के अजनबी

तप्त तमतमाता उद्दीप्त अंधेरो  का एक मटमैला पुलिंदा
सोता
अंतरतम के बिसरे से खंडहरों के तहखाने में
समझ के भटकते प्रकाश स्तम्भ
झुकते
सर खुजाते
इतना उन्मादित आग्रह
इतराती युवा मादकता की  अनगढ़ी सी जिद
और
इतना अँधेरा !
समझ के परे
विस्मृति की झीनी परतों  से बने बियाबान में
कभी सुलगती थी
पाप और आनंद से लीपी
एक भट्टी -
गर्माहट प्रत्यक्ष मूर्त और मांसल
ह्रदय आत्मा और शरीर कि जीवित उत्तेजना
एक प्रकट राग -
आज समझ और संवेदन  का
पराया भटका अजनबी। 

Thursday, December 12, 2013

क्यों कुरेदें इन बेजान आरजूओं

झल्लाया पागलपन और
आवारा हसरतों कि उहापोह
पूरी तरह लुट  जाने की ऊबी सी एक ललक,
और वो तुम्हारा चूक चूक जाना
मुझे पाप के पार ले जाने  में ।
सितम समेटे
बेआबरू अहसास बटोरे ,
पता तो है
कुछ महसूस करना है
पर कसक हो तो कुरेदें
इस बेजान आरज़ूओं के ढेर को।
खाली  काला आसमान का कतरा
निचोड़ा तो निकला फकत
खालीपन
ये जिंदगी के मुर्दा ज़र्रे
इतनी शिद्दत से सम्हालने क्यों पड़ते हैं ?

Saturday, October 26, 2013

मौत की लज्ज़त

डूब कर लबालब मुलायम ख्यालों में उठाई थी कलम
कागज तक पहुंचे तो खामोश हो गए
सोचा था आज तुम्हे लिखेंगे, अन्गढ़ी ख़ामोशी की स्याही जुटा भी ली थी
लिखने बैठे तो चुप्पी ही प्यारी लगने लगी
नयी टीस के उबाल ने बिछा दिया दर्द का नीला बिछोना, उभरने लगी थी कुछ पिघली सी आयतें
धूओं से बनते वो मेरे संवेदनो के प्रेत, खीचने लगे चढ़ती प्यास की दरारें
कहते
लिखो
लिखने बैठे तो रोजगारी अच्छी लगने लगी
न जाने अन्दर क्या कब मर गया
मौत की लज्ज़त भी कम लगने लगी

Tuesday, May 21, 2013

जिजीविषा की डूबती नब्ज़


सन्नाटे की ईटों से बनी नींद
नीली ओस की छेनी
हसरतों का पापी प्रेत
उकेरता
ताम्बे के झरनों  से सपने I
कसक के  अलक्षित मदमाते उन्माद से
सिंचा
मीठे नमक का पेड़,
ढांपे एक सुलगती बाम्बी को
जिसमे बरसती  अंतहीन प्यास
ये रिसती सी टीस
ही तो है
जीवन का मूक कोलाहल,
जिजीविषा की डूबती नब्ज़ I
इस डूबती नब्ज की मुर्दा भट्टी
में
राख कुरेदते
कट जाएगा एक और कल्प
इस
सन्नाटे की ईटों से बनी नींद में I

Saturday, December 22, 2012

मुश्किल होने लगा है अब

मुश्किल होने लगा है अब
पहले निराशा हताश नहीं करती थी
हर दुत्कार पता नहीं क्यों संभल संभल जाती थी
हर कटाक्ष की प्रतिध्वनी कुछ मुलायम कुछ संगीतमय हो आती थी
तुम्हारी उपेक्षा का  जाला  भी रेशम से बना था
कुछ उम्र कुछ उत्सर्ग कुछ समर्पण
बंधा देहिक मांसलता से
लिपटा प्रेम के मोटे मुलायम कम्बल मे-
हताशा नहीं होती थी .

पर अब मुश्किल होने लगा है
प्रश्नचिन्ह कुछ रोमानी सोचने को मजबूर नहीं करते
यथार्थ का यौवन अब रोमांचित नहीं करता
समझ थकाती है
तुम्हारी असफलता अब नहीं छेढ़ती
मेरी समझ के छोटे पड़ जाने के प्रलाप

अब कोई ओट  नहीं है
कोई भरम नहीं जो रोके रखे
यथार्थ के प्यासे प्रेतों को

किसको आवाज़ दूं ?
आज भी दया का  नाम नहीं दे सकता इसे
प्रेम- अगर है तो बहुत दूर है
और मैं थक रहा हूँ
मुश्किल होने लगा है अब 

Saturday, November 10, 2012

प्यास के अजीब स्थापत्य

प्यास की तरेड़ो में जीवाश्म सा दफन
सूखा झल्लाया
ढूँढने पर भी न मिलने वाले दंश सरीखा
ये मनोभाव।
दर्द की कथ्थई  झिल्ली के पुल पर खुरच खुरच कर
अपना अर्थ तलाशता।
प्यास के अजीब स्थापत्य
अंतरतम मर्मस्थलों पर खड़े
समझ के काँटों के प्रकाशस्तंभ
भटकाते आनंद के अंधे पोतों को।
कोहरे से बने संशय
नाचते
उन्मुक्त उन्माद के शवों पर।
पाप की आहुति के सुलगते ढेर पर
बैठा वो मनोभाव 
घिर रहा है डर के सूखे तिमिर में
कहीं समझ का सवेरा पूरा न हो जाये।