Wednesday, August 12, 2015

नदी सो रही है

एक नदी सो रही है
चांदनी की चादर ओढे
नीरव सन्नाटा झलता पंखा
एक आदिम गौरवगाथा सी लोरी गाती हवा
शहर ने भी मद्धिम कर लिए
अपने सुर


दिन में मिला था नदी से

न सन्नाटा न हवा
और न ही लिहाज़
सब झपट रहे थे
लालच से बना कोलाहल
शिकायतों का पुल बना रहा था

बस नदी ही थी जो

सोख रही थी
इस हवस, इस वहशीपन को
कुछ दर्द भी थे,
नदी मौके बे मौके
अपने गीले आँचल से
उनको पोंछ देती थी

मैं आश्वस्त था

नदी है तो
सब सम्हाल लेगी
इस लपकते झपकते अभाव की
की इंसानी लय
निकाल लेगी

अब नदी सो रही है

कृतज्ञ शहर, हवा, चाँद
और सन्नाटा

जानते हो,

कुछ अभागे शहरों के पास
नदी नहीं होती।

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