Wednesday, August 12, 2015

एक कविता लिखनी है

एक कविता लिखनी है।

सफ़ेद ख़ामोशी सी पागल
गुम अपनेपन सी मुलायम
खाली सन्नाटे के दोनो से ढकी
एक कविता लिखनी है।


बारिश को भिगोते शहर सी
खनकती पिघलती बातों सी
शर्माए हुए नशे सी
एक कविता लिखनी है।

करते ही भूले से वादे सी
किसी सिसकते पाप सी
किसी नापाक हसरत सी
एक कविता लिखनी है।

तेरी हिकारत के डंक सी
मेरी समझ के तंग मकबरे सी
इस मरीज दौर के वहशीपन सी
एक कविता लिखनी है।

कुछ दिल में
कुछ दिल के बाहर बिखरे
उस आमंत्रण सी
एक कविता लिखनी है।

कुछ हारने को
कुछ लुट जाने को
पर
बहुत ज्यादा महसूस करने को
एक कविता लिखनी है।

ए मेरी अबूझी टीस
मेरी कविता
कभी लिख मत जाना
तुझको चाह कर उदास रहता हूँ
आदत है मुझे
और एक ख़ुशी भी।

कुछ कर्ज उतारने के लिए नहीं होते

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