सुबह
कनेर के पेड़ पर रिश्ते सा उगता
एक पीला फूल
सुबह
थमे से समय की
एक शोख़ ख़ुमारी
सुबह
यादों के पानी से बनी
एक खिलहिलाहट
सुबह
जैसे दो बच्चों के बीच साझा
एक षड्यंत्र
कहीं रात ऊंघती है,
कहीं सपने लपकते है
खामोश शिकायतों के कुछ सिलसिले,
झूलती खुसफुसाहटें हसरतों की
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