Monday, February 22, 2016

औरों के सच

सुना है
औरों के भी अपने सच होते हैं
जैसे दूर गाँव में भी मेला लगता है
क्या संभव नहीं
एक आसमान का टुकड़ा जोड़े
उस सच को मेरे सच से

मेरे सिहरते सच
गहरे तो हैं पर पूरे नहीं
एक सिसकी
जो दर्द के ऊपर से गुजर जाती है
एक मुस्कराहट
जो आँखों तक नहीं पहुंचती

अगर सच सिर्फ अपना है तो
कम महसूस भी होता है
मिलता भी कम है
अँधेरे में छिडके काले रंग सा
बारिश में बहाए आंसूओ सा

हम माने बैठे थे
कविता नक्षत्रो की वो बूँद है
जो मुझमे जम कर मोती बनती है
पर है कहीं गैरों के भी सच
जो दे सकता है मुझे और मेरे शब्दों को
अनंत का विस्तार

डर बस इतना है
अपना सच जिया और महसूस किया होता है
बाकी सोचा जाता है
और
काव्य संवेदन है शास्त्र नहीं।

19 Dec, 2015

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