सुना है
औरों के भी अपने सच होते हैं
जैसे दूर गाँव में भी मेला लगता है
क्या संभव नहीं
एक आसमान का टुकड़ा जोड़े
उस सच को मेरे सच से
मेरे सिहरते सच
गहरे तो हैं पर पूरे नहीं
एक सिसकी
जो दर्द के ऊपर से गुजर जाती है
एक मुस्कराहट
जो आँखों तक नहीं पहुंचती
अगर सच सिर्फ अपना है तो
कम महसूस भी होता है
मिलता भी कम है
अँधेरे में छिडके काले रंग सा
बारिश में बहाए आंसूओ सा
हम माने बैठे थे
कविता नक्षत्रो की वो बूँद है
जो मुझमे जम कर मोती बनती है
पर है कहीं गैरों के भी सच
जो दे सकता है मुझे और मेरे शब्दों को
अनंत का विस्तार
डर बस इतना है
अपना सच जिया और महसूस किया होता है
बाकी सोचा जाता है
और
काव्य संवेदन है शास्त्र नहीं।
19 Dec, 2015
औरों के भी अपने सच होते हैं
जैसे दूर गाँव में भी मेला लगता है
क्या संभव नहीं
एक आसमान का टुकड़ा जोड़े
उस सच को मेरे सच से
गहरे तो हैं पर पूरे नहीं
एक सिसकी
जो दर्द के ऊपर से गुजर जाती है
एक मुस्कराहट
जो आँखों तक नहीं पहुंचती
कम महसूस भी होता है
मिलता भी कम है
अँधेरे में छिडके काले रंग सा
बारिश में बहाए आंसूओ सा
कविता नक्षत्रो की वो बूँद है
जो मुझमे जम कर मोती बनती है
पर है कहीं गैरों के भी सच
जो दे सकता है मुझे और मेरे शब्दों को
अनंत का विस्तार
अपना सच जिया और महसूस किया होता है
बाकी सोचा जाता है
और
काव्य संवेदन है शास्त्र नहीं।
19 Dec, 2015
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