झुलसती विरक्ति से पोसी
थकी सी रात का
सूना एक पल
रोशनियाँ बांधती
भूखे अंधेरों से बने चाँद
इक चुप्पी की रजाई
और वो टीसों का तांडव
अलगाव सी उदासी
एक उबा सा वैराग्य
शापित सृष्टियों से सजा
वो
सूना एक पल
कब खटखटाता है ये पल
भूले दोस्त सा अनमना सा
आ खड़ा होता है
जैसे
पुरानी चोट का दर्द
संवेदन के पटल पर
शरमाया सा एक दावा
एक झीनी सी प्यास
जो जिद तो नहीं करती
पर
घेर पूरा लेती है
उस पल के उलझे से सुख
उम्र की दीवार के सूखते रंग
भीतर का धुंधला संसार
सहसा मूर्त हो उठता
भटकते धुंए सा
कितना कीमती है इस पल का
काला खालीपन
जो मुझको मेरे और मेरे सच के
बीच से हटा देता है।
थकी सी रात का
सूना एक पल
भूखे अंधेरों से बने चाँद
इक चुप्पी की रजाई
और वो टीसों का तांडव
एक उबा सा वैराग्य
शापित सृष्टियों से सजा
वो
सूना एक पल
भूले दोस्त सा अनमना सा
आ खड़ा होता है
जैसे
पुरानी चोट का दर्द
शरमाया सा एक दावा
एक झीनी सी प्यास
जो जिद तो नहीं करती
पर
घेर पूरा लेती है
उम्र की दीवार के सूखते रंग
भीतर का धुंधला संसार
सहसा मूर्त हो उठता
भटकते धुंए सा
काला खालीपन
जो मुझको मेरे और मेरे सच के
बीच से हटा देता है।
13 Jan, 2016
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