Monday, February 22, 2016

अलगाव सी उदासी

झुलसती विरक्ति से पोसी
थकी सी रात का
सूना एक पल

रोशनियाँ बांधती
भूखे अंधेरों से बने चाँद
इक चुप्पी की रजाई
और वो टीसों का तांडव

अलगाव सी उदासी
एक उबा सा वैराग्य
शापित सृष्टियों से सजा
वो
सूना एक पल

कब खटखटाता है ये पल
भूले दोस्त सा अनमना सा
आ खड़ा होता है
जैसे
पुरानी चोट का दर्द

संवेदन के पटल पर
शरमाया सा एक दावा
एक झीनी सी प्यास
जो जिद तो नहीं करती
पर
घेर पूरा लेती है

उस पल के उलझे से सुख
उम्र की दीवार के सूखते रंग
भीतर का धुंधला संसार
सहसा मूर्त हो उठता
भटकते धुंए सा

कितना कीमती है इस पल का
काला खालीपन
जो मुझको मेरे और मेरे सच के
बीच से हटा देता है।

13 Jan, 2016

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