Monday, February 22, 2016

उम्र ही तो है

परछाइयों से एक सुलझा सा रिश्ता
धुले मकबरे शिकायतों के
समय की तरेड़ो में
प्यास की गुफाओं में
उम्र ही तो है।

ख्वाबों से हटती हसरतों की थकी सी धूल
टीसें छोड़ती अभिनय शायरी का
काले उलझे शोर को बंद कर
हो जाती है खुद से गुफ्तुगू
उम्र ही तो है।

कुछ मेले सिर्फ देखने के लिए होते
कुछ बहारो में हम नहीं भी होते
सर्द यादों के दहकते कुंड
कीमती समझौतों के उंघते सच
उम्र ही तो है।

महसूस करने और समझने के बीच की खाई पर
सब्र की बूंदों का पुल
तजुर्बे की शराब से न जाने
कितने अहसास गूंध लेता है
उम्र ही तो है।
16 Feb, 2016

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