Wednesday, February 21, 2018

साझेपन की गुदगुदी

साझेपन की एक गुदगुदी होती है
वो कुछ और न पाने की बड़ी महत्वाकांक्षा
वो लू से उड़ते दुःख
वो बेहद गहरे से जी ख़ुशियाँ
वो गुनगुनाती शिकायतै
वो क़ीमती समझौते
वो साथ चले क़दमों की पदचापें

वो साथ के सन्नाटों से बनी मिट्टी
जो बुन देती है एक ब्रह्माण्ड 
समय के उलझे पानी से गुँधकर 

वो साथ के  धुएँ से बनी छेनी
तराशती है पुराण 
उन पिघलते अहसासों के 

कोई पूरा तो किसी का नहीं होता है 
पर किसी से पूरा ज़रूर होता है
तुम हो तो 
एक बेहतर पूरापन मेरा है। 

एक रिश्ता अधिकारों का 
समझौतों का 
वक़्त का 
और उन ग़लतियों का 
जो ख़ुद की जाती हैं 
पर अकेले नहीं

एक कोना 
जहाँ अलगाव नहीं जाता
जहाँ रोने से डर नहीं लगता 
जहाँ हँसता है 
सामान्य का सम्मोहन 
जहाँ, 
ऐ मेरी हमसफ़र,
तुम हो

Feb 22, 2018





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