Wednesday, August 12, 2015

एक कविता लिखनी है

एक कविता लिखनी है।

सफ़ेद ख़ामोशी सी पागल
गुम अपनेपन सी मुलायम
खाली सन्नाटे के दोनो से ढकी
एक कविता लिखनी है।


बारिश को भिगोते शहर सी
खनकती पिघलती बातों सी
शर्माए हुए नशे सी
एक कविता लिखनी है।

करते ही भूले से वादे सी
किसी सिसकते पाप सी
किसी नापाक हसरत सी
एक कविता लिखनी है।

तेरी हिकारत के डंक सी
मेरी समझ के तंग मकबरे सी
इस मरीज दौर के वहशीपन सी
एक कविता लिखनी है।

कुछ दिल में
कुछ दिल के बाहर बिखरे
उस आमंत्रण सी
एक कविता लिखनी है।

कुछ हारने को
कुछ लुट जाने को
पर
बहुत ज्यादा महसूस करने को
एक कविता लिखनी है।

ए मेरी अबूझी टीस
मेरी कविता
कभी लिख मत जाना
तुझको चाह कर उदास रहता हूँ
आदत है मुझे
और एक ख़ुशी भी।

कुछ कर्ज उतारने के लिए नहीं होते

नदी सो रही है

एक नदी सो रही है
चांदनी की चादर ओढे
नीरव सन्नाटा झलता पंखा
एक आदिम गौरवगाथा सी लोरी गाती हवा
शहर ने भी मद्धिम कर लिए
अपने सुर


दिन में मिला था नदी से

न सन्नाटा न हवा
और न ही लिहाज़
सब झपट रहे थे
लालच से बना कोलाहल
शिकायतों का पुल बना रहा था

बस नदी ही थी जो

सोख रही थी
इस हवस, इस वहशीपन को
कुछ दर्द भी थे,
नदी मौके बे मौके
अपने गीले आँचल से
उनको पोंछ देती थी

मैं आश्वस्त था

नदी है तो
सब सम्हाल लेगी
इस लपकते झपकते अभाव की
की इंसानी लय
निकाल लेगी

अब नदी सो रही है

कृतज्ञ शहर, हवा, चाँद
और सन्नाटा

जानते हो,

कुछ अभागे शहरों के पास
नदी नहीं होती।

Friday, June 26, 2015

किसी एक का न होना

एक परत सी चढ़ जाती है
घर की किवाड़ो पर
किसी एक के न होने की ।

भूले रहते हैं
तब भी
जब ब्रह्माण्ड मुड़ कर देखता है
खामोश खाली उस कतरे को।


अबूझी उलझन सा
अमूर्त उदार
बिन मांगे सब देने को तैयार
ऊँघता रहता है
किसी एक का न होना ।

भूले रहते हैं
तब भी
जब प्रश्नचिन्ह बन दौड़ती है
गर्मी की खाली गली।
यादों का क्या
भूले हुए उधार सा कभी भी दबोच लेती हैं।

अब सलीका आड़े आ जाता है

अच्छा खासा सोच लेते थे
कुछ अय्याश गीत यारी मान
चले भी आते थे।

शिथिल होते सपनों को भी शर्म नहीं आती थी
अपनी गुनाहगार ज़लालत साझा करने में।

हो जाती थी बेपरवाह गुफ्तुगू
अपने रेशमी पापों से।

बुझी सिगरट सी चपटी हसरतें भी सोच लेती थी
इक अन्गढ़ी सी जीत।
अब सलीका आड़े आ जाता है।

Tuesday, May 26, 2015

सुबह का सुस्त कंफ्यूजन


इक शहर उठता है
सुस्त से कन्फ्यूज़न में
हजारों दर्द, उम्मीदें, और सपने
झपटते हैं
अपनी हिस्से की हसरतों पर

कुछ अल्हड़ आलस की एक्टिंग करता
नयी शुरुआत का भरम
शायद सुबह कहते थे उसे।

यथार्थ अभी भी कुछ लिहाज़ में है
पर मुरव्वत के चलन की भी अपनी सीमाएँ हैं।

गुलमोहर का पेड़ अपने रोमांटिक बिम्ब होने का
शर्मीला सा तगादा करता है।
अब हम ही कुछ ज्यादा समझने लगे हैं
इन इशारों की हकीकत

पर है तो कुछ अलग
सुबह का अपना एक अनकहा वादा
थोड़ा सा तैयार करो खुद को लुटने को
और ये सुबह समेट लेगी
तुम्हारे सारे पराजित सपने।

कुछ बुन लेते
कुछ भटक लेते हैं
इस सुबह को
छोड़ने का मन भी तो नहीं करता।

कुछ ख़ुमारी, कुछ रियाज़ और कुछ हमारा नसीब

कुछ तुम्हें शौक है मदहोशी बाँटने का
कुछ होश हमें रास भी नहीं आता

कुछ हमारी हसरतें है अधपकी सी
कुछ बेख्याल दुरुस्त भी है तुम्हारी बेरुखी

कुछ हमें हुनर है लुटने का
कुछ तुम्हे शऊर भी है बेवफाई का

कुछ तंगदिल तुम निकले
कुछ किस्से बुलंद भी हैं
हमारी फाकामस्ती के

कुछ हम यकीं जल्दी करते हैं
कुछ तुम्हें आदत भी है
उन बेपरवाह पलकों को झपकाने की

कुछ ख़ुमारी, कुछ रियाज़ और कुछ हमारा नसीब
तुम्हारी हिकारत का गुलाबी तंज
हमें गुलाबी ही लगता है।

Tuesday, February 17, 2015

विस्मृत भी कहीं सांस लेता है।

विस्मृत भी कहीं सांस लेता है।
कहीं आदतों के खंडहर में
तो
कही क़र्ज़ सी भारी उस मुस्कराहट में।

कुछ  बन कर सुर उजाड़ बियाबन का
छुप कर सुस्ताता है
हड्डियों के इस किले में
कुछ
बन कर चुभन फैलता है
सीलन की तरह

कुछ भी नहीं से परे
सलाखों के बीच के खालीपन सा
लिए खड़ा है
एक मुठ्ठी ब्रह्माण्ड
विस्मृत भी कही सांस लेता है।

ये उठाये हुए है अपनी नारकियता में
असीम दया के परचम
चाहता तो बैठा रहता
कुलबुलाते सर्पो सा
प्रत्यक्ष संवेदन की बाम्बी में

शायद वो समय की माप में नहीं आता
जिसमे जैसे बीमार के सपने सा वह
खुद को उकेर ले काले अँधेरे से
और आ खड़ा हो
स्मृति की काल कोठरी से
अनाथालय में
प्रत्यक्ष संवेदन।।

फिर भी
किनारे जा बैठा
पराजित कुलीन सा
छोड़ कर हमें अपने सीमित सुरक्षित
छोटे से खिलौने से यथार्थ में
अपनी अबूझ समझ में मुस्कुराता
विस्मृत भी कही सांस लेता है।