Thursday, March 31, 2022

नफ़रतों में मज़ा आने लगे

 नफ़रतों में मज़ा आने लगे 

खिलखिलाहटें चुभने लगे 
घावों को संजोने लगो 
मुस्कुराहटों से डरने लगो 

याद कर लेना 
जीवित मंदिर हो तुम 
मुर्दा खंडहर नहीं 

खंडहर हमारी स्मृति होते हैं
जब हम सिर्फ़ स्मृति हो जाते हैं 
तो हम खंडहर हो जाते हैं
मंदिर के प्राण 
स्मृति भर से नहीं 
श्रधा प्रेम
और 
मेरे तुम्हारे साथ साथ झुके सिरों से हैं 

आज की बूँदों का संगीत 
आज की बैठकों की खनक
आज की बच्चियों का चुलबुला अधिकार
कल के पीपल पर बैठे
डर के प्रेतों पर हावी है
होना चाहिए 

हम मुर्दा हो जाते हैं 
जब 
स्मृतियाँ सपनों से ज़्यादा हो जाती हैं 

24 Feb 2021

मेरा प्रेम मेरा है, शायद नहीं है जवाबदेह तुम्हारी नफ़रत के मक़बरे में

 

सच सच क्यों है

इसलिए क्योंकि मैं एक हद के बाद नापना बंद कर देता हूँ 


डर भी डर इसलिए है 
क्योंकि मैं एक हद के बाद बहादुर बनने को नहीं तैयार हूँ

दुख दुःख इसलिए है 
क्योंकि एक हद के बाद मेरे दिल ने वो किवाड़ खोल दी है

ख़ुशी ख़ुशी क्यों है 
क्योंकि वो आ खड़ी हुई है बस

मेरे सच , मेरे डर, मेरे दुःख और मेरी ख़ुशियाँ 
सही है कि नापी जा सकती हैं , नकारी जा सकती हैं 

आज तुम्हारे पास मेरा सारा इतिहास हैं
पर मेरा वजूद शायद अभी भी मेरा है 

आज शायद तुम्हारे पास सारे सचों की किताब हैं 
पर मुझे इजाज़त दो कि मैं अपने सच को ख़ुद खोजूँ

शायद तुम्हारे पास होंगे और भी माफ़िक़ मौक़े डरने के
मेरे दिल को हक़ है मेरा होने का

क्या हो नहीं सकता की की मेरे डर का पोस्टमोर्टम न हो
क्या मेरी ख़ुशी की एक बूँद अपने में अमीर नहीं हो सकती
क्या मेरा दुःख सारे दुःखों से अलग नहीं हो सकता

मेरा प्रेम मेरा है 
शायद नहीं है जवाबदेह तुम्हारी नफ़रत के मक़बरे में 

एक बात बोलूँ
सुनोगे 
दिलों की बातें दिलों से समझी जाती हैं 
बही खातों से तो हिसाब होते हैं 

2 नवंबर 2020

एक साथ बदलते हुए भी वैसे ही रहना

एक साथ बदलते हुए भी वैसे ही रहना।

शायद पन्ने बदलते हैं बढ़ते हैं,
पर किताब वो ही रहती है ।

जैसे भूली रस्में कभी भी जाग खड़ी होती है
उम्र के उस आरामदेह दर्द की तरह,

पुरानी दोस्ती भी कोने में ऊँघता एक साझापन है,
वो कहीं नहीं जाता।

3 Jan, 2020

Sunday, December 29, 2019

एक साझा ख़ामोशी

एक साझा ख़ामोशी
एक दूसरे के साथ डूब कर ख़ामोश हो जाना 
आवाज़ोंऔर शोरों के बीच तैरते सन्नाटे से बुन लेना 
कुछ ख़यालों से बने लिबास


एक खिलखिलाता बहाव चाहिए 
एक ग़ैरज़रूरी, बिना जोड़ा पर बेहद गहरे से जिया बहाव
ख़ामोशी गहरी होती जाती 
जब वो बोलना छोड़ बाँधना शुरू कर दे 

कुछ हासिल है अगर इस साँस लेते बही खाते का 
तो वो है
इस आरामदेह ख़ामोशी में तली
मेरी तेरी उम्रें 

वो सन्नाटा जो अचानक ही घेर गया था हमें
पसर गया था पुल बनके हमारे दरमियान
वो आज भी है मेरे होने में 
एक ज़िंदा जादू बनके 
30 Dec, 19

Monday, September 2, 2019

समझ एक भरी पूरी निर्धनता

समझ एक ठहराव है 
समझ का एक अभाव होता है 
सामंजस्य सम्मोहन और गति विहीनता

समझ एक लय की प्राप्ति है 
एक विलंबित 
प्रायः स्तब्ध लय
गति से परे 

समझ एक भरी पूरी निर्धनता है
गहरे नशे में सुस्त नदी
न भूख , न क्रोध , न तड़प
और शायद न ही कविता

समझ एक मुकम्मल प्यार है 
एक रंगीन सहमापन 
एक सुरों का बना पिंजरा
एक रुका हुआ घना काला आराम
 
समझौते  ज़िंदा रखते है
शायद सुखी भी
समझौते क़ीमत वसूलते है
और 
समझौते समझ से बने होते है। 
 
9 Aug, 2019

कृति- एक साझा हँसी

हर कृति हर उस शब्द की वंशज है जो हमने पढ़ा।

हर उस क्षण की पुत्री है जिसे हमने जिया।

हर उस साझा हँसी की विरासत है जिसे हमने छलकाया

हर उस दुःख , समझौते और प्रेम जिनकी हमने गवाही दी, क़ीमत दी।

कृति का वज़न
उसका कलेवर
उसका साँस लेता असर
उन क़ब्रों से है
जो हैं तो किसी दूसरे के बियाबन मैं
पर खुलती हैं हमारे सूने अंतर्मन में

कृति

एक बड़े आसमान में उसकी हवा की छेनी से
अपना एक कोना उकेरती है
उस सफ़ेद भीड़ के बने ख़ाली पन में
वो मेरा सम्वेदन ही तो है
जो रचता है नए पुराण
उन प्राग़ेतिहासिक दर्दों के
जिन्हें मुझ से पहले भी कईयों ने छेड़ा था।

इस राग की नदी में हम सब साझा हैं
कौन सी बूँद किस पाताल में कौन सा सुर छेड़ेंगी
ये प्रारब्ध का मुद्दा है
शोध का नहीं
 
8 July, 2019

कुछ सूनेपन सा गहरा महसूस करूँ

एक लम्बी साँस सी बहती नीली नदी में 
सुलगता एक सपना 

चुभते सन्नाटे में बदल जाता है 
सीधी बात सा मुश्किल सपना

शब्द साज़िश करते 
आरोप सी ख़ामोशियों के महल बुनते 

कुछ सूनेपन सा गहरा महसूस करूँ और 
गहराई तुमको दूँ उपहार में
न विद्वता, न सौंदर्य बोध और न ही शर्म 
बस हो लरजता तड़पता 
मेरा सम्वेदन
और 
आदिम ख़ालिस आह्लाद सी 
सहज नग्न 
मेरी अभिव्यक्ति





8 June, 2019