एक लम्बी साँस सी बहती नीली नदी में
सुलगता एक सपना
चुभते सन्नाटे में बदल जाता है
सीधी बात सा मुश्किल सपना
शब्द साज़िश करते
आरोप सी ख़ामोशियों के महल बुनते
कुछ सूनेपन सा गहरा महसूस करूँ और
गहराई तुमको दूँ उपहार में
न विद्वता, न सौंदर्य बोध और न ही शर्म
बस हो लरजता तड़पता
मेरा सम्वेदन
और
आदिम ख़ालिस आह्लाद सी
सहज नग्न
मेरी अभिव्यक्ति
8 June, 2019
No comments:
Post a Comment