हर कृति हर उस शब्द की वंशज है जो हमने पढ़ा।
हर उस क्षण की पुत्री है जिसे हमने जिया।
हर उस साझा हँसी की विरासत है जिसे हमने छलकाया
हर उस दुःख , समझौते और प्रेम जिनकी हमने गवाही दी, क़ीमत दी।
कृति का वज़न
उसका कलेवर
उसका साँस लेता असर
उन क़ब्रों से है
जो हैं तो किसी दूसरे के बियाबन मैं
पर खुलती हैं हमारे सूने अंतर्मन में
कृति
एक बड़े आसमान में उसकी हवा की छेनी से
अपना एक कोना उकेरती है
उस सफ़ेद भीड़ के बने ख़ाली पन में
वो मेरा सम्वेदन ही तो है
जो रचता है नए पुराण
उन प्राग़ेतिहासिक दर्दों के
जिन्हें मुझ से पहले भी कईयों ने छेड़ा था।
इस राग की नदी में हम सब साझा हैं
कौन सी बूँद किस पाताल में कौन सा सुर छेड़ेंगी
ये प्रारब्ध का मुद्दा है
शोध का नहीं
8 July, 2019
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