Thursday, November 5, 2015

तुम हो या ....

आंखे है या
साथ से दहकती एक साझा शाम

देखा तो
रिश्तों की उलझी सी सहूलियत
कुलबुला उठी

रचा तो
घिर आया सपनों की  बूंदों से सिला
जिन्दा मुलायमअँधेरा

सोचा तो
पसर गया टीसों के चुभते बिस्तर पर
उद्दाम उछाह उन्माद

मिले तो
सकपका गया सुलगती हसरतों का
बेलगाम पागलपन

तुम हो या
आवारा दिन के भटकाव का
भूला हिसाब

20 August 2015

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