Thursday, November 5, 2015

पता तो है

पता तो है
पर चलो आज जिद का कारोबार करते हैं
आज मना करते हैं
ख़ुशी से दुश्मनी की इस आदत को

पता तो है
पर चलो आज लड़ ही जाते हैं इस उलझे गुबार से
आज भूल जाते हैं
खुद की रोती भूलों को

पता तो है
पर चलो आज इस सूनी रात में बुन दें कुछ नई गजलें
आज तोड़ देते हैं
इस काले कोहरे के प्याले को

पता तो है
पर आज जी लेते हैं उधार के एक गीत को
आज रोक लेते है
अपनी ही धड़कन को खुद को गाली देने से

पता तो है
पर आज लुटने से  पीछे क्या हटना
आज एक आकाश गंगा पार करते है
बुलबुलों से बने इस उम्मीद के ख्वाब पर

पता तो है
पर आज नहीं मानते इस दूरी को
आज पोसेंगे
खालिस अंधरे से बनी इस बेकरारी को

पता आखिर क्यों है......

August 2015

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