Thursday, November 5, 2015

इस पिघलते समर्पण में

सुन्न सन्नाटा सफ़ेद
दिल के झोलों के रेगिस्तान
रेशमी बे करारी के सुस्त धुंए
आओ लाते है झीनी सी स्याही
और लिखते हैं तुम्हारा नाम
इन सांस लेते अंधेरों पर

सुलगता आमंत्रण
एक उलझता सा आकर्षण
एक बोलता सा वजन
लरजते पाप से इस क्षण में
आओ मिलते हैं किसी भटकते चाँद पर

सुनहरा छलकता एक पागलपन
घने कोहरे से बनी दीवार सा उन्माद
इस पिघलते समर्पण में
आओ बुन ले एक उमर

कहते हैं पुराने रिश्ते पुराने हो जाते हैं
पर क्यों होता है खंडहर का एक कोना
सारे असलीपन का सबसे शानदार घर
इतिहास के आराम से भरा साथ
साझा एक ब्रहमांड

हर बीता पल ,
यादों का एक दुर्ग
खुलते ख़त सा संभावनाओ से भरा

एक यात्रा
अजीब, कितनी उदार
सिर्फ झूमते बादल सा एक साझेपन का एक ठप्पा
आओ मुझे अहसास करा दो कि
मेरी दो बाहें भी है
घोंसला एक संसार का

29 August 2015

No comments:

Post a Comment