Tuesday, August 22, 2017

होने चाहिए कुछ घोंसले

वक़्त की खुरदुराहट
महज़
सपनों की मौत का सबब नहीं होनी चाहिए

बनने चाहिए कुछ घोंसले
जहाँ रह सके
शायरी


कुछ सिगरेट के धुएँ से
चाय के धब्बों से बने
अड्डे...
जहाँ रह सके
महफ़िल

उम्र सिर्फ़ झुकाए
उलझन सिर्फ़ उलझाए
प्यार सिर्फ़ डराए
नशा सिर्फ़ गिराए ...

ऐसे में
होने चाहिए कुछ
घोंसले
अड्डे
जहाँ रह सकें
कुछ सहमी सी हसरतें।

June 13, 2017

कई तुम घिर आते हो ख़ालीपन में

किसी सुस्त से मुहल्ले से
एक जैसे पर अलग अलग आवाज़ों से बने
कई मकान होते हैं
ख़ालीपन में

रिसता सा अकेलापन
और उसके छिटके से संगीत
कई भूले रेगिस्तान होते हैं
ख़ालीपन में

जमीं शिकायतों से
धड़कते गुनाहों से
कई फिसलते ठहराव होते
ख़ालीपन में

ये बरसता है
हसरतों की तरह
रिश्तों की तरह उगते
कई उधार होते हैं
ख़ालीपन में

आदत बन गयी दोस्तियों से
ख़ुद से की गई कई बेवफ़ाइयो से
कई टूटे मज़ार होते हैं
ख़ालीपन में

क्या ख़ूब है तुम्हारा न होना
कई तुम घिर आते हो
ख़ालीपन में

11 June, 2017

खनकती चुभन तुम्हारे न होने की

जैसे बरसती हो
बेनाम बे आवाज़ बारिश
किसी भूले सागर के
धुँधले कोने में

जैसे फैलती हो
अनमनी सी कस्तूरी
किसी अनछुए जंगल के
कँवारे सन्नाटे में

जैसे सुलगती हो
पराई सी चाँदनी
किसी अनजान आकाशगंगा के
मौन झूलते अकेलेपन में

वैसे ही तुम्हारा न होना
भर देता है मुझे
उस बिना जिए ख़ालीपन की
खनकती चुभन से

12 May, 2017

Thursday, April 27, 2017

वो पिघलते साक्ष्य सा संवेदन

शायद उधार ही लिया था 
वो पिघलते साक्ष्य सा संवेदन ,
एक क्षण को वो ही तो था 
ऊंघते ब्रह्माण्ड का उन्मादित आमंत्रण 

पर उफनती  नदी सिर्फ बह  नहीं रही थी 
चल और जल भी रही थी ,
छोड़ती  पीछे मृत सूखे पठार 
वो पिघलते साक्ष्य सा संवेदन 

उदास प्यास की तरेड़ें 
कुरेदी बड़े जतन  से उड़ते युगों तक,
कुछ आदत तो कुछ हमारा आलस  
गुम गया, खो गया 
वो पिघलते साक्ष्य सा संवेदन 

28 April, 2017

Monday, October 10, 2016

अमिताभ - कौतूहल सा एक राग

एक पूरे दौर की हसरतों से बना
आवाज़ का वो महल
सशक्त समर्थ सअर्थ आवाज़
जिसके नुकीले गहरेपन पे मुड़ता है 
उन्मादित युग का एक सागर

आवाज़ जो ढोती है 
एक ज़माने के दर्द 
उसके सपने
उसके प्रेम
और उसका गुस्सा

इस आवाज़ के महल में
सिर्फ दीवारें आवाज़ की बनी हैं
इसे बसाती हैं इसकी खामोशियाँ
इस महल का मालिक 
खेलता है इन सन्नाटों से
बुनता है इन चुप्पियों से
और रचता है इन हँसते अंधेरों से
ये आवाज़ तो बस जिन्दा सांस लेता बर्तन है
उन खामोशियों के जलते स्पंदन का

एक कोलाहल धड़कता है
उन शून्य सघन सन्नाटों में
कौतूहल सा एक राग 
टटोल जाता हमारे संवेदन

परदे पर
उन तिलस्मी अंधेरों में
क्या उकेर जाते हो
हो जैसे तुम्हारा ही कोई तर्जुमा

अभिनय का क्या है
 वो तो शायद नकली भी होता है
तुम सिखाते हो संवेदनाओं को जिन्दा रहना

कहते हैं चिंगारी क्षणिक होती है
सुना है सूरज भी एक चिंगारी है।

11 October, 2016

Friday, September 2, 2016

अजीब है तुम्हारा तसव्वुर

अजीब है तुम्हारा तसव्वुर
धुओं से बने कसीदों सा
जिनका तर्जुमा करना ही तो मेरा होना है।

उलझी बहस से हैं वो तुम्हारे रस्ते
वो खड़ा मैं उन रस्तों पर
अपने ही इंतज़ार में
सूखी ठंडी आग सी वो तुम्हारी बेदिली
ख़ाक न हो सके
हमारी बेकसी

वो साझा शामें शिकायतों की
इन शिकायतों की उलझनों से ही तो उभरती है
अफवाह मेरी जिंदगी की

रूठा सा खालीपन
उसमे डूबती उतरती मेरी प्यास
छीलती तुम्हारी मौजूदगी
अजीब है तसव्वुर तुम्हारा।

Monday, August 15, 2016

लकीरें और कुछ सफेदी

पता तो है
कि
चाँद एक मुठ्ठी में नहीं आता
संसार मेरे बस्ते में नहीं धड़कता
समझ में आता है
रोजी रोटी का कारोबार
अब बड़े हो गए हैं
बड़े?
शायद।
पता तो नहीं चलता
हाँ हैं कुछ
लकीरें और कुछ सफेदी
पर वैसे ही लफंगी हैं हसरतें
वैसी ही घबराहट
वैसे ही लपकता है आवारा पागलपन
आज भी किसी चेहरे, किसी गोद या मुस्कुराहट
में देख लेते हैं ब्रह्मांड की सीमाए
पर पता है
फडफडाता झंडा
खून खौलाने वाला नारा
15 अगस्त का लड्डू
आज़ादी नहीं है
क्यों इतने बड़े हो गए

15 August, 2016