Tuesday, August 22, 2017

कई तुम घिर आते हो ख़ालीपन में

किसी सुस्त से मुहल्ले से
एक जैसे पर अलग अलग आवाज़ों से बने
कई मकान होते हैं
ख़ालीपन में

रिसता सा अकेलापन
और उसके छिटके से संगीत
कई भूले रेगिस्तान होते हैं
ख़ालीपन में

जमीं शिकायतों से
धड़कते गुनाहों से
कई फिसलते ठहराव होते
ख़ालीपन में

ये बरसता है
हसरतों की तरह
रिश्तों की तरह उगते
कई उधार होते हैं
ख़ालीपन में

आदत बन गयी दोस्तियों से
ख़ुद से की गई कई बेवफ़ाइयो से
कई टूटे मज़ार होते हैं
ख़ालीपन में

क्या ख़ूब है तुम्हारा न होना
कई तुम घिर आते हो
ख़ालीपन में

11 June, 2017

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