मन के सूखते शमशान
छटपटा कर कुरेदो तो
कविता लिख तो जाती है
अपने अखड़पन में कमज़ोर
अपनी चोटों से तपी
किसी फ़क़ीर के अय्याश लम्हे सी
किसी हारे कुलीन के आख़री दान सी
नशे में हारी मर्यादा सी
लिख तो जाती है
छटपटा कर कुरेदो तो
कविता लिख तो जाती है
अपने अखड़पन में कमज़ोर
अपनी चोटों से तपी
किसी फ़क़ीर के अय्याश लम्हे सी
किसी हारे कुलीन के आख़री दान सी
नशे में हारी मर्यादा सी
लिख तो जाती है
कविता अगर लत है, लहर है, भरम है
तो ज़िद भी है
7 January 2017
तो ज़िद भी है
7 January 2017
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