धमनियों में धूप सा बहता
पलकों के पीछे जमा
एक भूला सा दर्द
अब अपना सा नहीं लगता
पलकों के पीछे जमा
एक भूला सा दर्द
अब अपना सा नहीं लगता
भूले रहते हैं
उन ख़ुशनुमा पराजयों की चुभन
स्तम्भित मौन
छिपा के रखी उन आवारागियों के संगीत
नहीं गुफ़्तगू होती अब
अपनी भूलों के कारवाँ से
ज़िद्दी सितमों के उन
संगमरमर से मुलायम अंधेरों से
कुछ मरती इन रंगीनियों ने मायूस करदिया
कुछ हम भी सयाने हो चले
शायरी को आवाज़ देने का मन तो करता है
पर ऐसे हसीन गुनाह हो जाते हैं, किए नहीं जाते
13 January, 2017
उन ख़ुशनुमा पराजयों की चुभन
स्तम्भित मौन
छिपा के रखी उन आवारागियों के संगीत
नहीं गुफ़्तगू होती अब
अपनी भूलों के कारवाँ से
ज़िद्दी सितमों के उन
संगमरमर से मुलायम अंधेरों से
कुछ मरती इन रंगीनियों ने मायूस करदिया
कुछ हम भी सयाने हो चले
शायरी को आवाज़ देने का मन तो करता है
पर ऐसे हसीन गुनाह हो जाते हैं, किए नहीं जाते
13 January, 2017
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