सुबह आज भी उतरती है
वैसे ही साँस लेती नमी के साथ
वो मोहक शांति
और अंगड़ाई लेते दरख़्त
फिर क्यों एक फुसफुसाता ख़ाली पन
आ खड़ा होता है।
बिसरे दोस्त सा
आज भी सफ़र अमीर करता है
संभावनाओं से
स्मृतियों से
साझा साधे पलों से
फिर क्यों एक रिसती टीस
उभर आती है
दिल की दीवार में सीलन सी
आज भी आवारा फ़ितूर
डुबोता है
किसी नशीली उलझन सा
फिर क्यों एक सर्द चुभन
तराश जाती है
एक सिसकता सा अँधेरा
उफनता तड़प ढूँढ़े
उस ख़ालीपन को
टीस को और
चुभन को
आप रहो न मेरे साथ
अपने न होने का डंक बन कर ।
14 Oct, 2018
14 Oct, 2018
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